कॉलेज की सड़क के किनारे बैठे आते जाते सबको ताकना, कैंटीन की दो रुपए की चाय, अफ अम अस की कैंटीन में रद्दी सी पेप्सी में पैसे बेकार करना, प्लास्टिक की टूटी कुर्सियों पर बैठे....
अपनी जिंदगी के उन अधूरे लम्हों में पूरी जिंदगी को जी लेना ।
दो मिनट में हजारो सपने देख लेना , और दो मिनट में ही तोड़ देना
चाय के कप के साथ जब भी सोचती हु तो डर लगता है
जिंदगी अभी भी अधूरी है उन लम्हों में
हाथ खुलते ही रेत की तरह लम्हे फिसल जाते है