Thursday, September 25, 2008

आखिरी मुलाकात

कॉलेज की सड़क के किनारे बैठे आते जाते सबको ताकना, कैंटीन की दो रुपए की चाय, अफ अम अस की कैंटीन में रद्दी सी पेप्सी में पैसे बेकार करना, प्लास्टिक की टूटी कुर्सियों पर बैठे....

अपनी जिंदगी के उन अधूरे लम्हों में पूरी जिंदगी को जी लेना ।

दो मिनट में हजारो सपने देख लेना , और दो मिनट में ही तोड़ देना

चाय के कप के साथ जब भी सोचती हु तो डर लगता है

जिंदगी अभी भी अधूरी है उन लम्हों में

हाथ खुलते ही रेत की तरह लम्हे फिसल जाते है

1 comment:

addictionofcinema said...

jo lamhe bikhar gaye unhe fir se dhundhna hi to zindagi hai dost.
aur hum sab usi talash me kharch ho rahe hain
aur kharch kar rahe hain apni zindagi ke wo din
jo fir yaad ayenge ye din beet jane ke baad.
nice lines u wrote
congrats