Wednesday, August 11, 2010

राह में साथ चलते मुसाफिरों के लिए..

जब आपको मंजिल की दुरी का पता नही होता..
तो रास्ता काटना मुश्किल नही लगता ..
लेकिन मंजिल सामने नज़र आने पर वो दो कदम चलने भी भारी लगते हे ॥
वक़्त हे की चलने का नाम नही लेता
और पैर आगे बढ़ने का नाम नही लेते
रास्ता मुश्किल हे इसलिए या किसी चीज़ के खोने का डर हे ??
उन रास्तो पर साथ चलते मुसाफिर... जिनके साथ जिंदगी के सबसे ख़ूबसूरत पल बीते
अगर वो साथ छोड़दे ... तो रास्ता तो कट जाए लेकिन वो मंज़िन्ल मिलने की ख़ुशी
ख़ुशी नही रहती ... ख़ुशी के अहसास को महसूस करने का काम वही साथ चलते मुसाफिर कराते हे

लेकिन ये सब समजने kइ बाद भी आप उन मुसाफिरों की भी परवाह क्यों नही करते ...
क्योंकि भरोसा होता हे मंजिल पर पहुचकर सब ठीक हो जायेगा
ये लाइन लिखना आसान हे लेकिन इन लaino के बिच क्या हुआ... और क्या नही ... इसका हिसाब इन रास्तो पर चलने वाला और उन मुसाफिरों को khone वाला ही बता सकता हे




Thursday, September 25, 2008

आखिरी मुलाकात

कॉलेज की सड़क के किनारे बैठे आते जाते सबको ताकना, कैंटीन की दो रुपए की चाय, अफ अम अस की कैंटीन में रद्दी सी पेप्सी में पैसे बेकार करना, प्लास्टिक की टूटी कुर्सियों पर बैठे....

अपनी जिंदगी के उन अधूरे लम्हों में पूरी जिंदगी को जी लेना ।

दो मिनट में हजारो सपने देख लेना , और दो मिनट में ही तोड़ देना

चाय के कप के साथ जब भी सोचती हु तो डर लगता है

जिंदगी अभी भी अधूरी है उन लम्हों में

हाथ खुलते ही रेत की तरह लम्हे फिसल जाते है

Friday, July 11, 2008

तमन्ना

एक छोटी सी लड़की
सफेद स्कर्ट, शर्ट पहने
पापा का हाथ थामे जा रही है,
काली सी सड़क पर
पापा का हाथ छोड़, अकेले चल पड़ी है क्योंकि बड़ी हो गई है
लेकिन नही जानती की सड़क सच में काली है