Wednesday, August 11, 2010

राह में साथ चलते मुसाफिरों के लिए..

जब आपको मंजिल की दुरी का पता नही होता..
तो रास्ता काटना मुश्किल नही लगता ..
लेकिन मंजिल सामने नज़र आने पर वो दो कदम चलने भी भारी लगते हे ॥
वक़्त हे की चलने का नाम नही लेता
और पैर आगे बढ़ने का नाम नही लेते
रास्ता मुश्किल हे इसलिए या किसी चीज़ के खोने का डर हे ??
उन रास्तो पर साथ चलते मुसाफिर... जिनके साथ जिंदगी के सबसे ख़ूबसूरत पल बीते
अगर वो साथ छोड़दे ... तो रास्ता तो कट जाए लेकिन वो मंज़िन्ल मिलने की ख़ुशी
ख़ुशी नही रहती ... ख़ुशी के अहसास को महसूस करने का काम वही साथ चलते मुसाफिर कराते हे

लेकिन ये सब समजने kइ बाद भी आप उन मुसाफिरों की भी परवाह क्यों नही करते ...
क्योंकि भरोसा होता हे मंजिल पर पहुचकर सब ठीक हो जायेगा
ये लाइन लिखना आसान हे लेकिन इन लaino के बिच क्या हुआ... और क्या नही ... इसका हिसाब इन रास्तो पर चलने वाला और उन मुसाफिरों को khone वाला ही बता सकता हे




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